“करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान,
रसरी आवत-जात ते सिल पर पड़त निशान।”
कबीरदास जी की यह प्रसिद्ध पंक्ति हमें जीवन का एक महत्वपूर्ण सत्य सिखाती है—निरंतर अभ्यास और मेहनत से कठिन से कठिन कार्य भी आसान हो जाता है। मनुष्य जन्म से पूर्ण नहीं होता। वह अपने अनुभव, मेहनत और लगातार अभ्यास से अपनी क्षमताओं को विकसित करत
अभ्यास क्यों जरूरी है?
कबीरदास जी ने अभ्यास की शक्ति समझाने के लिए रस्सी और पत्थर का उदाहरण दिया है। कुएँ पर बार-बार आने-जाने वाली रस्सी एक कठोर पत्थर पर भी निशान बना देती है। जब एक साधारण रस्सी लगातार प्रयास से पत्थर पर निशान बना सकती है, तो मनुष्य निरंतर मेहनत से अपने जीवन में बड़ा परिवर्तन क्यों नहीं ला सकता?
रस्सी और पत्थर का उदाहरण
कबीरदास जी ने अभ्यास की शक्ति समझाने के लिए रस्सी और पत्थर का उदाहरण दिया है। कुएँ पर बार-बार आने-जाने वाली रस्सी एक कठोर पत्थर पर भी निशान बना देती है। जब एक साधारण रस्सी लगातार प्रयास से पत्थर पर निशान बना सकती है, तो मनुष्य निरंतर मेहनत से अपने जीवन में बड़ा परिवर्तन क्यों नहीं ला सकता?
असफलता से न घबराएँ
अक्सर लोग पहली असफलता के बाद प्रयास करना छोड़ देते हैं। वास्तव में असफलता हमें अपनी कमियों को पहचानने और उन्हें सुधारने का अवसर देती है। जो व्यक्ति गिरकर दोबारा उठता है और अपने प्रयास जारी रखता है, वही अंततः सफलता प्राप्त करता है।
निष्कर्ष
निष“करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान” केवल एक दोहा नहीं, बल्कि जीवन में आगे बढ़ने का मंत्र है। प्रतिभा से अधिक महत्वपूर्ण निरंतर मेहनत, धैर्य और अभ्यास है। यदि हम अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार रहें और बिना रुके प्रयास करते रहें, तो एक दिन सफलता निश्चित रूप से हमारे कदम चूमेग