भूमिका
“करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, रसरी आवत-जात ते सिल पर पड़त निशान।”
यह प्रसिद्ध दोहा महान कवि संत कबीरदास का है। इसका अर्थ है कि लगातार अभ्यास करने से कम बुद्धि वाला व्यक्ति भी बुद्धिमान और कुशल बन जाता है। जिस प्रकार कुएँ से पानी निकालने वाली रस्सी के बार-बार आने-जाने से कठोर पत्थर पर भी निशान पड़ जाते हैं, उसी प्रकार निरंतर मेहनत और अभ्यास से असंभव लगने वाले कार्य भी संभव हो जाते हैं।
आज के समय में यह दोहा पहले से भी अधिक प्रासंगिक है। सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। हर बड़ी उपलब्धि के पीछे वर्षों की मेहनत, धैर्य और निरंतर अभ्यास छिपा होता है। चाहे पढ़ाई हो, खेल हो, संगीत हो, कला हो या व्यवसाय—हर क्षेत्र में सफलता पाने के लिए लगातार प्रयास करना आवश्यक है।